समाजिक असमानता हमारे समाज का विशिष्ट लक्षण है । भारत के वंचित वर्गो पर जाति एवं जेंडर के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
समाजिक असमानता हमारे समाज का विशिष्ट लक्षण है । भारत के वंचित वर्गो पर जाति एवं जेंडर के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
अथवा
समाजिक असमानता से आप क्या समझते है ? भारतीय समाज में जाति सम्बन्धों के सन्दर्भ में जाति व्यवस्था की विवेचना कीजिए ।
एक समतावादी समाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए सच्चे समाजिक न्याय का विचार एवं समानता का दृष्टिकोण - दो महत्वपूर्ण शर्ते है । भारत में समाजिक न्याय की अवधारणा यहां के समाज में व्याप्त भेदभाव एवं पक्षपात के प्रतिक्रिया स्वरूप उभरकर सामने आई । इस भेदभाव से युक्त समाजिक व्यवस्था के अंदर समाज के कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को ही सारी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाता था। वस्तुतः ब्राह्मणवादी हिन्दू ( जो कि मूलतः आर्य थे ) ने एक असमान समाजिक व्यवस्था का प्रसार किया जो मानवता की विरोधी थी ।
समाजिक असमानता हमारे भारतीय समाज के विशिष्ट लक्षण के रूप में प्राचीनकाल से ही विद्यमान रही है । भारत में जाति व छुआ - छूत की उत्पति अति - प्राचीनकाल में अर्यो के आगमन के साथ हुई । आर्य लोग यहां के ' देशज ' लोगो को निकृष्ट मान कर देय दृष्टि से देखने लगे । उत्तर ऋग्वैदिक काल में " चाण्डाल " जाति का उल्लेख मिलता है । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी चाण्डाल को अछूतों के रूप में दिखाया गया है।
भारतीय समाज में अछूत होने से तात्पर्य जाति व्यवस्था में काफी निम्न स्तर पर होना था । यह भारत की आबादी में करीब 16% है तथा इनकी संख्या लगभग 140 मिलियन है ।
जातियों के मध्य अंतर श्रम से संबंधित है । निम्न जातियां ( शुद्ध ) व ( अतिशुद्ध ) खेती तथा उस तरह का कार्य करते थे जो सबसे घृणात्मक कार्य माना जाता था । उच्च जातियों में , बौद्धिक कार्य ( ब्राह्मण ) , प्रशासनिक कार्य ( क्षत्रिय ) , तथा व्यवस्था से सम्बन्धित ( वैश्य ) , वर्ग सम्मलित थे ।
औनिवेशिक काल में जाति व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए क्योंकि इस समय भारतीय समाज पर आधुनिकीकरण , धर्म - निरपेक्षीकरण एवं शहरीकरण जैसी शक्तियां अपना प्रभाव जमा रही थी । समाजिक न्याय जैसी नवीन नवीन वैचारिक अवधारणाओं ने धार्मिक पवित्रता व अपवित्रता के विचार पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए । राजनीतिक समाज ने इन पद - दलित व उत्पीड़ित जातियों की आड़ में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष में तेजी ला दी ।
https://www.edukaj.in/2020/08/discuss-various-theories-of-human-right.html
जेंडर भी वर्ग और जाति से सम्बन्धित है । पुरुषों व महिलाओ के बीच श्रम विभाजन इतिहास के विभिन्न चरणों में उभर कर सामने आया है । भारतीय समाज सदैव पुरुष प्रधान समाज रहा है । इसका महत्वपूर्ण कारण पुरुषों की उत्पादन व्यवस्था मै महत्वपूर्ण भूमिका है । महिलाओ की स्थिति पूर्णतः पुरुषों पर निर्भर है । महिलाओ की पहचान घर - दीवारी के अतंर्गत थी । हिन्दू धर्म - ग्रंथो में महिला की इस पहचान के लिए महत्वपूर्ण भूमिका है । 1960 से जेंडर आधारित असमानता को मिटाने की दिशा में उठाए गए कदम के बावजूद भी पूरे विश्व में महिलाओ का काम करने में 66 % योगदान होता है । कुल वैश्विक आय का 10 % ही वह कमाती है तथा विश्व कि कुल संपति में उनका हिस्सा 1 % ही है । 19 वीं शताब्दी में महिला स्थिति सुधार की दिशा में व्यापक प्रयास हुए । सर्वप्रथम राजाराम मोहन राय ने सतिप्रथा , विधवा विवाह के समर्थन में अभियान चलाया । 1980 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में दहेज हत्या व बलात्कार को प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया । इस आंदोलन ने विभिन्न वर्गो , जातियों , एवं संस्कृति की महिलाओ तक अपने विचार फैलाने के लिए शक्तिशाली एवं दृढ़ संकल्प महिलाओ कि एक नई विचारधारा का समर्थन किया । पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के विचार को बढ़ावा देने के लिए धर्मो कि भी फिर से व्याख्या की गई ।
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