अलंकार किसे कहते है?
अलंकार
अलंकार में 'अलम्' और 'कार' दो शब्द का अर्थ है-भूषण जावट अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करे, वह अलंकार है। सिक्यों अपने साज-शृंगार के लिए आभूषणों का प्रयोग करती है. अतएव आभूषण' अलंकार' कहलाते हैं। ठीक इसी प्रकार कविता कामिनी अपने शृंगार और सजावट के लिए जिनों का उपयोग प्रयोग करती है, से अलंकार कहलाते है। अत: हम कह सकते हैं कि काव्य के शोभाकारक धर्म अलकार है। जिस प्रकार र आदि अलंकार रमणी के नैसर्गिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं, उसी प्रकार अनुप्राप्स, यमक और उपमा आदि अलंकार काव्य के सौंदर्य को अभिवृद्धि करते हैं। वस्तुतः अलंकार वाणी के शृंगार हैं। इनके द्वारा अभिव्यक्ति में स्पष्टता, प्रभावोत्पादकता और चमत्कार आ जाता है।
उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यों को देखिए :
1. (क) राकेश की चाँदनी यमुना के जल पर चमक रही थी।
(ख) चारुचंद्र की चपल चांदनी चमक रही यमुना जल पर।
2. (क) उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
(ख) सावन के बादलों-सी उसकी आँखें बरसने लगीं।
3. (क) पति को छोड़कर और कोई वरदान ले लो।
(ख) घर को छोड़ और घर ले लो।
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उपर्युक्त तीनों उदाहरणों के 'क' और 'ख' भागों में एक ही बात भिन्न-भिन्न रूपों में कही गई है। स्पष्ट है कि 'क' की अपेक्षा '' में कहीं अधिक सौंदर्य है। इसका कारण यह है कि 'ख' भाग में अलंकार के प्रयोग ने चमत्कार और सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है।
ध्यान रहे कि अलंकार का प्रयोग सदा ही कथन के सौंदर्य की अभिवृद्धि नहीं करता। कभी-कभी कोई अलंकारविहीन कथन भी अपनी सहजता और सादगी में मनोरम लगता है और यदि उसे अलंकारों से लाद दिया आए तो उसको स्थिति ऐसी हो सकती है जैसे किसी नैसर्गिक रूप से सुंदर युवती को आभूषणों से लादकर भौंडो और कुरूप बना दिया गया हो।
भाषा और साहित्य का सारा कार्य व्यापार शब्द और अर्थ पर ही निर्भर है: अतएव विशिष्ट शब्द चमत्कार अथवा अर्थ-वैशिष्ट्य ही कंपन के सौंदर्य को अभिवृद्धि करता है। इसी आधार पर अलंकार के दो भेद किए गए हैं:
1. शब्दालंकार
2. अर्थालंकार
1. शब्दालंकार- जहाँ किसी कथन में विशिष्ट शब्द प्रयोग के कारण चमत्कार अथवा सौंदर्य आ जाता है, वहाँ' शब्दालंकार' होता है। शब्द को बदलकर उसके स्थान पर उसका पर्याय रख देने पर यह चमत्कार समाप्त हो जाता है जैसे :-
वह बाँसुरी को धुनि कानि परै, कुल- कानि हियो तजि भाजति है।
उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में कानि शब्द दो बार आया है। पहले शब्द कानि का अर्थ है कान और दूसरे शब्द कानि का अर्थ है मर्यादा इस प्रकार एक ही शब्द दो अलग-अलग अर्थ देकर चमत्कार उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार का शब्द प्रयोगशब्दालंकार' कहलाता है। यदि कुल कानि के स्थान पर 'कुल मर्यादा' या 'कुल-मान' प्रयोग कर दिया जाए तो वैसा चमत्कार नहीं आ पाएगा।
2. अर्थालंकार- जहाँ कथन-विशेष में सौंदर्य अथवा चमत्कार विशिष्ट शब्द प्रयोग पर आश्रित न होकर अर्थ की विशिष्टता के कारण आया हो, वहाँ अर्थालंकार होता है, जैसे-
'मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला'
इस काव्य-पंक्ति में वसंत के आगमन पर उसकी सज-धज और शोभा की सादृश्यता किसी महंत की सवारी के साथ करते हुए, चमत्कार उत्पन्न किया गया है। यहाँ अर्थालंकार के एक प्रमुख भेद उपमा का सौंदर्य है जिसके बारे में विस्तार से आगे विचार किया जाएगा।
प्रमुख शब्दालंकार
1. अनुप्रास अलंकार
2. यमक अलंकार
3. श्लेष अलंकार
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1. अनुप्रास अलंकार
जहाँ वर्गों की आवृत्ति से चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
• कल कानन कुंडल मोर पंखा डर पे बनमाल विराजति है।
-इस काव्य-पंक्ति में 'क' वर्ण की तीन बार और 'ब' वर्ग की दो बार आवृत्ति होने से चमत्कार आ गया है।
• छोटी गोस्ट या चोटी अहीर को। से चमत्कार आ गया है।
-इस पंक्ति में अंतिम वर्ण 'ट' को एक से अधिक बार आवृत्ति होने से चमत्कार आ गया।
• सुतिसुंदर सुखसुमन तुम पर खिलते हैं।
- इस काव्य-पंक्ति में पास-पास प्रयुक्त 'सुरभित', 'सुंदर', 'सुखद' और 'सुमन' शब्दों में 'स' वर्ण की आवृत्ति हुई है।
● विभवशालिनी विश्वपालिनी दुखहर्जी है, भय निवारिणी, शांतिकारिणी सुखकर्ता है।
-इन काव्य-पंक्तियों में पास-पास प्रयुक्त शब्द 'विभवशालिनी' और 'विश्वपालिनी' में अंतिम वर्ण 'न' को आवृत्ति और
'भय-निवारिणी' तथा 'शांतिकारिणों में की आवृत्ति हुई है।
अन्य उदहारण:-
•जो खंग हाँ तो बसेरो करी मिलि काङ्गलदो कूल कदंब की डारन।
('क' वर्ग की आवृत्ति)
• केकन किंकित नूपुर धुनि सुसन राम हृदय गुनि।
('क' और 'न' वर्गों को आवृत्ति)
● मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत बुलाए
('म' और 'स' वर्णों की आवृत्ति)
● संसार की समरस्थती में धीरता धारण करो।
('स' और 'घ' वर्गों को आवृत्ति)
● विमल वाणी ने बीणा लो कमल कोमल कर में सप्रीत
('व' और 'क' वर्गों की आवृति)
● तरनि-तनुजा तर तमाल तस्वर बहु छाए।
('त' वर्ण की आवृत्ति)
• चारुचंद्र को चंचल किरणें खेल रही थी, जल-पल में
("च' और 'ल' वर्गों की आवृत्ति)
• भुज भुजगेम की वे सांगनी भुजोगनी सी खेदि खेदि खाति दोह दारुन दलन के
('म', 'न' 'ख' तथा 'द' क्यों की आवृति)
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2. यमक अलंकार
तब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ हर बार भिन्न हो तो यहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण:
● कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लोनी, रति-रति सोभा सब रति के सरीर की।
-पहली पंक्ति में बेनी शब्द की आवृत्ति दी बार हुई है। पहली बार प्रयुक्त शब्द 'बेनो' कवि का नाम है तथा दूसरो बार प्रयुक्त ' बेनी' का अर्थ है 'चोटी'। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में प्रयुक्त रति शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। पहली बार प्रयुक्त रति-रति का अर्थ है 'रत्तो' के समान जरा-जरा-सी और दूसरे स्थान पर प्रयुक्त 'रति' का अर्थ है-कामदेव की परम सुंदर पत्नी "रति"। इस प्रकार ' बेनी' और 'रति' शब्दों को आवृत्ति से चमत्कार उत्पन्न किया गया है।
• काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिलें।
-उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में शरद के आगमन पर उसके सौंदर्य का चित्रण किया गया है। वर्षा बीत गई है, शरद ऋतु आ गई है। काली घटा का घमंड घट गया है। घटा शब्द के दो विभिन्न अर्थ है- घटा'काले बादल और घटा कम हो गया। घट शब्द ने इस पंक्ति में सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है। यह 'यसक' का सौंदर्य है।
• भजन कहयौ ताते भन्यो, भन्यौ न एको बार
दूरि भजन जाते की, सो तू भन्यो गँवार ॥
-प्रस्तुत दोहे में भजन और भन्यों शब्दों की आवृत्ति हुई है। भजन शब्द के दो अर्थ हैं: भजन भजन-पूजन और भजन भाग जाना। इसी प्रकार भन्यों के भी दो अर्थ है भन्यौ भजन किया और भन्यौ भाग गया। इस प्रकार भजन और भज्यौ शब्दों की आवृत्ति ने इस दोहे में चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। कवि अपने मन को फटकारता हुआ कहता है: है मेरे मन जिस परमात्मा का मैंने तुझे भजन करने को कहा, तू उससे भाग खड़ा हुआ और जिन विषय-वासनाओं से भाग जाने के लिए कहा. तू उन्हीं की आराधना करता रहा। इस प्रकार इन भिन्नार्थक शब्दों की आवृत्ति ने इस दोहे में सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है।
अन्य उदाहरण
• कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय
वा खाए बौराए जग, या पाए बौराय॥
(कनक सोना, कनक धतूरा)
• माला फेरत जुग भया, फिरा न मनका फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।
(मनकामाला का दाना, मन का हृदय का)
•जे तीन बेर खाती थीं ते तीन बेर खाती हैं।
(तीन बेर तीन बार तीन बेर तीन बेर के दाने)
• तू मोहन के उरबसी हवै उरबसी समान
• पच्छी परछीने ऐसे परे पर छोने बोर, तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।
3. श्लेष अलंकार
'श्लेष' का अर्थ है 'चिपकना'। जहाँ एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त होने पर दो अर्थ दे वहाँ श्लेष अलंकार होता है। दूसरे शब्दों में, जहाँ एक ही शब्द से दो अर्थ चिपके हो वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण:
● चरन धरत चिता करत, चितवत चहुँ ओर।
सुबरन को ढूँढ़त फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।।
- उपर्युक्त दोहे को दूसरी पंक्ति में सुबरन का प्रयोग किया गया है जिसे कवि, व्यभिचारी और चोर-तीनों बूंद रहे हैं। इस प्रकार एक शब्द सुवरन के यहाँ तीन अर्थ है (क) कवि सुवरन अर्थात् अच्छे शब्दः (ख) व्यभिचारी मुवान अर्थात् अच्छा रूप-रंग और (ग) चोर भी सुबरन अर्थात् स्वर्ण ढूँढ़ रहा है। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।
● 'मंगन को देखिपट देत बार बार है।
- इस काव्य पंक्ति में 'पट' के दो अर्थ है: (क) और (ख) किवाड़ पहला अर्थ है वह व्यक्ति किसो याचक को देखकर उसे बार-बार 'वस्त्र' देता है और दूसरा अर्थ है वह व्यक्ति याचक को देखते ही दरवाजा बंद कर लेता है। अतएव यहाँ 'श्लेष' अलंकार का सौंदर्य है।
अन्य उदाहरण
• मधुवन की छाती को देखो, सूखी कितनी इसकी कलियाँ।
(क) खिलने से पूर्व फूल की दशा;
(ख) यौवन से पहले की अवस्था।
● जो रहीम गति दीप को कुल कपूत गति सोय ।
बारे उजियारो कर बड़े अंधेरो होय ॥
बारे (क) बचपन में (ख) जलाने पर।
बड़े (क) बड़ा होने पर (ख) बुझने पर।
●को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर
प्रमुख अर्थालंकार
1. उपमा अलंकार
2. रूपक अलंकार
3. उत्प्रेक्षा अलंकार
4. मानवीकरण अलंकार
5. अतिशयोक्ति अलंकार
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1. उपमा अलंकार
अत्यंत सादृश्य के कारण सर्वथा भिन्न होते हुए भी जहाँ एक वस्तु या प्राणों की तुलना सिद्ध वस्तु या प्राणों से है,वहाँ उपमा अलंकार होता है।
दो पक्षों की तुलना करते समय उपमा के निम्नलिखित चार तत्वों को ध्यान में रखा जाता है:
(क) उपमेय- जिसको उपमा दी जाए अर्थात् जिसका वर्णन हो रहा है, उसे उपमेय या प्रस्तुत कहते हैं। ‘चाँद-सा सुंदर मुद्र
इस उदाहरण में 'मुख' उपमेय है।
(ख) उपमान- वह प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी जिससे उपमेय की तुलना की जाए, उपमान कहलाता है। उसे अप्रस्तुत भी कहा हैं। ऊपर के उदाहरण में 'चाँद' उपमान है।
(ग) साधारण धर्म- उपमेय और उपमान का परस्पर समान गुण या विशेषता व्यक्त करने वाले शब्द साधारण धर्म कहते हैं।
इस उदाहरण में 'सुंदर' साधारण धर्म को बता रहा है।
(घ) वाचक शब्द- जिन शब्दों की सहायता से उपमा अलंकार की पहचान होती है। सा, सी, तुल्य, सम, जैसा, ज्यों, स के समान-आदि शब्द वाचक शब्द कहलाते हैं।
यदि ये चारों तलय उपस्थित हो तो पूर्णापमा होती है, परंतु कई बार इनमें से एक या दो लुप्त भी हो जाते हैं, तब उसे मा कहते हैं। अब निम्नलिखित उदाहरणों से उपमा अलंकार को समझिए:
उदाहरण
● 'मखमल के झूल पड़े, हाथी-सा टोला'।
-उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में टीला उपमेय है, मखमल के झूल पढ़े हाची उपमान है, सा वाचक है; किंतु इसमें साधारण धर्म नहीं है। वह छिपा हुआ है। कवि का आशय है-'मखमल के झूल पड़े 'विशाल' हाथी-सा टोला।' यहाँ विशाल जैसा कोई साधारण धर्म लुप्त है; अतएव इस प्रकार को उपमा का प्रयोग लुप्तोपमा अलंकार कहलाता है।
● प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे।
- उपर्युक्त काव्य-पंक्ति में प्रातःकालीन नभ उपमेय है, शंख उपमान है, नीला साधारण धर्म है और जैसे वाचक शब्द हैं। यहाँ उपमा के चारों अंग उपस्थित हैं; अतएव यहाँ पूर्णापमा अलंकार है।
• काम-सा रूप, प्रताप दिनेश-सा
सोम-सा शौल है राम महीप का।
- उपर्युक्त उदाहरण में राम उपमेय है, किंतु उपमान, साधारण धर्म और वाचक तीन हैं-काम-सा रूप, दिनेश-सा प्रताप और सोम-सा शील। इस प्रकार जहाँ उपमेय एक और उपमान अनेक हों, वहाँ मालोपमा अलंकार होता है। मालोपमा' होते हुए भी यह पूर्णोपमा है क्योंकि यहाँ उपमा के चारों तत्त्व विद्यमान हैं।
अन्य उदाहरण:
• हरिपद कोमल कमल से।
[हरिपद (उपमेय), कमल (उपमान), कोमल (साधारण धर्म) से (वाचक शब्द)]
• हाय! फूल-सौ कोमल बच्ची, हुई राख की थी ढेरी।
[फूल (उपमान), बच्ची-उपमेय, कोमल (साधारण धर्म), सी (वाचक शब्द)]]
• असंख्य कीर्ति रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी।
• यह देखिए, अरविंद से शिशुवृंद कैसे सो रहे।
• नदियाँ जिनकी यशधारा-सी बहती हैं अब भी निशि-वासर।
• पीपर पात सरिस मन डोला।
• मुख बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल-सा बोधित हुआ।
• कोटि कुलिस-सम वचन तुम्हारा व्यर्थ धरहु धनु वान कुठारा॥
विशेष: उपमा के उदाहरण में पूर्णोपमा का ही उदाहरण देना चाहिए।
2. रूपक अलंकार
जहां गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में ही उपमान का अभेद आरोप कर दिया गया हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
• उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुवर बाल पतंग ।
विकसे संत-सरोज सब, हरये लोचन-भृंग ॥
-प्रस्तुत दोहे में उदयगिरि पर 'मंच' का, रघुवर पर 'बाल-पतंग' (सूर्य) का, संतों पर 'सरोज' का एवं लोचनों पर
'भ्रंगों' (भौरों) का अभेद आरोप होने से रूपक अलंकार है।
• विषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक ।
-इस काव्य-पंक्ति में विषय पर 'वारि' का और मन पर 'मीन' (मछली) का अभेद आरोप होने से रूपक का सौंदर्य है।
• 'मन-सागर, मनसा लहरि, बूड़े-बहे अनेक ।'
-प्रस्तुत पंक्ति में मन पर सागर का और मनसा (इच्छा) पर लहर का आरोप होने से रूपक अलंकार है।
• सिर झुका तूने नियति की मान ली यह बात।
स्वयं ही मुर्झा गया तेरा हृदय- जलजात ॥
-उपर्युक्त पंक्तियों में हृदय-जलजात में 'हृदय' उपमेय पर जलजात (कमल) उपमान का अभेद आरोप किया गया है।
• शशि-मुख पर घूँघट डाले अंचल में दीप छिपाए।
-यहाँ मुख उपमेय में शशि उपमान का आरोप होने से रूपक अलंकार का चमत्कार है।
• 'अपलक नभ नील नयन विशाल'
यहाँ खुले आकाश पर अपलक विशाल नयन का आरोप किया गया है।
अन्य उदाहरण :
• मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों ।
(यहाँ 'चंद्रमा' (उपमेय) में 'खिलौना' (उपमान) का आरोप है)
• चरण-कमल बंदौ हरिराई।
(यहाँ 'हरि के चरणों' (उपमेय) में 'कमल'उपमान का आरोप है)
• सब प्राणियों के मत्तमनोमयूर अहा नचा रहा।
• पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
• रामनाम मनि-दीप धरु, जीह-देहरी द्वार।
• एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास ।
3. उत्प्रेक्षा अलंकार
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना अथवा कल्पना कर ली गई हो, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसके बोधक शब्द हैं : मनो, मानो, मनु, मनहु, जानो, जनु, जनहु, ज्यों आदि ।
उदाहरण :
• मानो माई घनघन अंतर दामिनि ।
घन दामिनि दामिनि घन अंतर, सोभित हरि-ब्रज भामिनि ॥
-उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में रासलीला का सुंदर दृश्य दिखाया गया है। रास के समय हर गोपी को लगता था कि कृष्ण उसके पास नृत्य कर रहे हैं। गोरी गोपियाँ और श्यामवर्ण कृष्ण मंडलाकार नाचते हुए ऐसे लगते हैं मानो बादल और बिजली,बिजली और बादल साथ-साथ शोभायमान हो रहे हों। यहाँ गोपिकाओं में बिजली की और कृष्ण में बादल की संभावना की गई है। अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है।
• चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।
मनहु सुरसरिता विमल, जल उछरत जुग मीन ॥
-यहाँ झीने घूँघट में सुरसरिता के निर्मल जल की और चंचल नयनों में दो उछलती हुई मछलियों की अपूर्व संभावना की गई है। उत्प्रेक्षा का यह सुंदर उदाहरण है।
• सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात ।
मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात ॥
-उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों में श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम शरीर में नीलमणि पर्वत की और उनके शरीर पर शोभायमान पीतांबर में प्रभात की धूप की मनोरम संभावना अथवा कल्पना की गई है।
• उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उसका लगा।
मानो हवा ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा ॥
-उपर्युक्त पंक्तियों अर्जुन के क्रोध काँपते शरीर सागर के तूफ़ान की संभावना की गई है।
• कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए ॥
-इन पंक्तियों उत्तरा के अश्रुपूर्ण नेत्रों (उपमेय) में ओस जल-कण युक्त पंकज (उपमान) की संभावना की ग वाचक शब्द प्रयुक्त हुआ है।
अन्य उदाहरण
• मुख बाल रवि सम लाल होकर, ज्वाल-सा बोधित हुआ।
• मनु दृग फारि अनेक जमुन निरखत ब्रज सोभा।
• ले चला तुझे कनक, ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण-झनक
• ज़रा-से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो।
• पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के,
मेघ आए बड़े बन ठन के सँवर के।
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4. मानवीकरण अलंकार
जहाँ जड़ पर चेतन का आरोप अर्थात् जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं तथा क्रियाओं का आरोप हो, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
• बीती विभावरी जाग री।
अंबर पनघट में डुबो रही तारा घट उषा नागरी।
'उषा' पर 'नागरी' का आरोप होने के कारण मानवीकरण अलंकार है।
● लो यह लतिका भी भर लाई,
मधु मुकुल नवल रस गागरों।
● मेघ आए बड़े बन-उन के सेंवर के।
● दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही
संध्या सुंदरी परी-सी धीरे-धीरे।
5. अतिशयोक्ति अलंकार
जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ अथवा कथन (उपमेय) का वर्णन लोक-सीमा से बढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
● भूप सहस दस एकहिं बारा। लगे उठावन टरत न टारा ॥
-धनुभंग के समय दस हज़ार राजा एक साथ ही उस धनुष (शिव-धनुष) को उठाने लगे, पर वह तनिक भी अपनी जगह से नहीं हिला। यहाँ लोक-सीमा से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है, अतएव अतिशयोक्ति अलंकार है।
• चंचला स्नान कर आए, चंद्रिका पर्व में जैसे।
उस पावन तन की शोभा, आलोक मधुर थी ऐसे ॥
-नायिका के रूप-सौंदर्य का यहाँ अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है।
अन्य उदाहरण :
• आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार ॥
(राणा अभी सोच ही रहे थे कि घोड़ा नदी के पार हो गया। यह यथार्थ में असंभव है।)
• हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जल गई, गए निसाचर भाग ॥
(यहाँ हनुमान की पूँछ में आग लगने से पहले ही लंका के जल जाने का उल्लेख किया गया है जो कि असंभव है।)
• वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड़ से जयद्रथ का इधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।
• जिस वीरता से शत्रुओं का सामना उसने किया।
असमर्थ हो उसके कथन में मौन वाणी ने लिया ॥
प्रमुख अलंकारों में अंतर
(क) यमक और श्लेष-
यमक अलंकार में एक शब्द अनेक बार प्रयुक्त होता है और हर बार उसका अर्थ भिन्न होता है लेकिन श्लेष में शब्द एक बार ही प्रयुक्त होता है लेकिन उसके विभिन्न अर्थ निकलते हैं; जैसे-
यमक-कनक कनक - तै सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय ॥
-यहाँ कनक शब्द दो बार दोहराया गया है। लेकिन दोनों बार अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। इसका एक जगह अर्थ निकलता है 'सोना' और दूसरी जगह 'धतूरा '
श्लेष- रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुस चून ॥
-यहाँ पानी शब्द में श्लेष है। पानी का अर्थ मोती के संदर्भ में चमक, मानुस के संदर्भ में इज्जत तथा चून के संदर्भ में जल है।
(ख) उपमा और रूपक-
उपमा में उपमेय और उपमान में समानता दिखाई देती है, जबकि रूपक में उपमेय तथा उपमान को एक मान लिया जाता है, जैसे
• मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
-उपमा [उपमेय (मुख) और उपमान (चंद्रमा) में समानता]
● मुख चंद्रमा है।
-रूपक [उपमेय और उपमान एक समान]
(ग) उपमा और उत्प्रेक्षा-
उपमा में उपमेय और उपमान में समानता दिखाई देती है, जबकि उत्प्रेक्षा में उपमेय में संभावना की कल्पना की जाती है; जैसे-
• मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
- उपमा
• मुख मानो चंद्रमा है।
-उत्प्रेक्षा [उपमेय (मुख) में उपमान (मानो) की कल्पना]
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ध्यान देने योग्य
1. अलंकार काव्य के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते हैं।
2. अलंकार के दो भेद हैं :
शब्दालंकार, अर्थालंकार।
3. वर्णों की आवृत्ति 'अनुप्रास अलंकार' कहलाती है।
4. एक शब्द का भिन्न अर्थ में एक से अधिक बार प्रयोग 'यमक अलंकार' होता है।
5. जहाँ एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, पर संदर्भ से भिन्न-भिन्न अर्थ दे, वहाँ 'श्लेष अलंकार' होता है।
6. अत्यंत सादृश्य के कारण एक वस्तु या प्राणी की तुलना, दूसरी प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से करने पर 'उपमा अलंकार' होता है।
7. जहाँ अत्यंत समानता के कारण उपमेय पर उपमान का आरोप कर अभेद कर दिया जाए, वहाँ 'रूपक अलंकार' होता है।
8. उपमेय में उपमान की संभावना 'उत्प्रेक्षा अलंकार' है।
9. जहाँ जड़ पर चेतन का आरोप हो, वहाँ 'मानवीकरण अलंकार' होता है।
10. जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ अथवा कथन को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाए, वहाँ ' अतिशयोक्ति अलंकार' होता है।
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