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Showing posts with the label हिन्दी व्याकारण

अलंकार किसे कहते है?

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  अलंकार अलंकार से तात्पर्य -  अलंकार में 'अलम्' और 'कार' दो शब्द का अर्थ है-भूषण जावट अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करे, वह अलंकार है। सिक्यों अपने साज-शृंगार के लिए आभूषणों का प्रयोग करती है. अतएव आभूषण' अलंकार' कहलाते हैं। ठीक इसी प्रकार कविता कामिनी अपने शृंगार और सजावट के लिए जिनों का उपयोग प्रयोग करती है, से अलंकार कहलाते है। अत: हम कह सकते हैं कि काव्य के शोभाकारक धर्म अलकार है। जिस प्रकार र आदि अलंकार रमणी के नैसर्गिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं, उसी प्रकार अनुप्राप्स, यमक और उपमा आदि अलंकार काव्य के सौंदर्य को अभिवृद्धि करते हैं। वस्तुतः अलंकार वाणी के शृंगार हैं। इनके द्वारा अभिव्यक्ति में स्पष्टता, प्रभावोत्पादकता और चमत्कार आ जाता है।  उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यों को देखिए : 1. (क) राकेश की चाँदनी यमुना के जल पर चमक रही थी।   (ख) चारुचंद्र की चपल चांदनी चमक रही यमुना जल पर। 2. (क) उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।     (ख) सावन के बादलों-सी उसकी आँखें बरसने लगीं। 3. (क) पति को छोड़कर और कोई वरदान ले लो।      (ख) घर को ...

भारतीय किसान , भारतीय किसान की दशा ,भारतीय किसान: देश की रीढ़

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  भारतीय किसान  कृषक का स्वभाव एवं श्रम  भारत गांवों का देश है । भारत का ह्रदय गांवों में ही बसता है । गांवो में ही परिश्रम और सेवा के अवतार किसान बसते हैं, जो नगरवासियों के अन्नदाता ही नहीं सृष्टि के पालक हैं । भारतीय किसान ' कठोर परिश्रम ' , सरल ह्रदय , त्याग और तपस्वी जीवन , सादगी , जैसे गुणों  का पर्याय है । कड़कड़ाती सर्दी , चिलचिलाती धूप , घनघोर वर्षा , हाड़ कपा देने वाली सर्दी में भी वह एक तपस्वी की भांति अपनी साधना में लीन रहता है । वह हर विपत्ति को चुपचाप सहन कर लेता है , अभावों में जीने की उसे आदत है , रूखा - सुखा खाकर वह अपना पेट भर लेता है , मोटा कपड़ा पहनकर वह अपना तन ढंक लेता है । अपने इस कठोर जीवन की वह न तो कभी किसी से शिकायत करता है  तथा न ही स्वंय के लिए ऐश्वर्य एवं भोग - विलास की सामग्री की मांग । उसके जीवन का तो बस एक ही उद्देश्य है - मिट्टी से सेना उत्पन्न करना और अन्नपूर्णा की तरह दूसरो का पेट भरना । https://www.edukaj.in/2022/12/sustainable-human-development-issues.html एक बार नारद ने भगवान विष्णु से पूछा , " हे प्रभु! अपका परम भक्त कौन है...

अर्थ की दृष्टि से वाक्य - भेद

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अर्थ की दृष्टि से वाक्य - भेद इस आर्टिकल में आपको हिंदी व्याकरण के महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है । https://www.edukaj.in/2023/02/astronomers-succeeded-by-discovering-12.html वाक्य का स्वरूप      जब भी हमें अपने मन की बात दूसरो तक पहुंचानी होती है या किसी से बातचीत करनी होती है तो हम वाक्यों का सहारा लेकर ही बोलते हैं। यद्यपि वाक्य विभिन्न शब्दों (पदों)  योग से बनता है और हर शब्द  अपना अलग अर्थ भी होता है, पर वाक्य  आए सभी घटक परस्पर मिलकर एक पूरा वाक्य विचार या सन्देश प्रकट करते है। वाक्य छोटा हो या बड़ा किसी - न - किसी विचार या भाव को पूर्णतः व्यक्त करने में क्षमता रखता है। अतः        भाषा की वह लघुत्तम इकाई जिसके माध्यम से वक्ता अपने भावों एवं विचारो को संप्रेषित करता है , वाक्य कहलाता है। अवश्य पढ़े:- https://www.edukaj.in/2022/02/take-health-insurance-and-save-your.html ' वाक्य में निम्नलिखित बातें होती है :  1. वाक्य की रचना पदों एवं पदबंधो के योग से होती है। 2. वाक्य अपने में पूर्ण तथा स्वतंत्र होता है। 3. वाक्य किसी - न - किसी ...

अनौपचारिक व औचारिक पत्र कैसे लिखे?

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अनौपचारिक व औचारिक पत्र के उदहारण  अनौपचारिक पत्र प्रश्न:-1:-     अपने पिता जी को पत्र लिखकर बताइए कि आपके विद्यालय का वार्षिकोत्सव किस प्रकार मनाया गया।                                         अथवा विद्यालय के वार्षिकोत्सव में पुरस्कार - प्राप्ति की प्रसन्नता का वर्णन करते हुए अपने पिता जी को एक पत्र लिखिए। परीक्षा भवन  नई दिल्ली दिनांक : 21 जुलाई, 20XX पूज्य पिता जी सादर चरण स्पर्श आपका कुशल - पत्र यथासमय प्राप्त हो गया था। कार्य की व्यस्तता के कारण पत्रोत्तर में विलंब के लिए क्षमा - प्राथी हूं। वस्तुत: पिछले एक माह से माह से हम विद्यालय के वार्षिकोत्सव की तैयारी में लगे हुए थे। कल ही यह वार्षिकोत्सव आयोजित किया गया था, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:           गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी विद्यालय को दुल्हन की तरह सजाया गया था। इस अवसर पर माननीय शिक्षा निदेशक तथा अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।  सरस्वती वंदना के साथ वार्षिकोत्सव के ...

पत्र कैसे लिखें? अच्छा पत्र लिखने के तरीके क्या है?

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पत्र लेखन :- मानव समाज के सभी कार्यों में आपसी संपर्क और बात करने को आवश्यकता होती हैं। पर हर कार्य के लिए सदा सामने बैठकर बात करना संभव नहीं होता। अतः मनुष्य को अनेक कार्यों के लिए पत्र - व्यवहार की आवश्यकता होती है। पत्र - लेखन एक कला है। एक अच्छा पत्र वह है जिससे प्राप्तकर्ता पूरी बात स्पष्ट रूप से समझ जाए। आवश्यक नियम :- एक अच्छे पत्र में निम्नलिखित गुण होने चाहिए - 1. सभी बातें क्रमबद्ध होनी चाहिए , जिससे कि एक के बाद दूसरी बात का परस्पर संबंध स्पष्ट हो। 2. भाषा शुद्ध और सरल हो और जो कहना हो वह स्पष्ट हो। 3. केवल आवश्यक बातें ही हो जिससे कि मुख्य तात्पर्य पर दृष्टि रहे। 4. कई बातें कहनी हो तो प्रत्येक को स्पष्ट रूप रखने के लिए , प्रत्येक बात के लिए अलग - अलग अनुच्छेद हो। 5. एक ही बात बार - बार नहीं दोहरानी चाहिए। 6. पत्र एक दम से नहीं समाप्त करना चाहिए बल्कि उसमे समाप्ति की पूर्ण भावना होनी आवश्यक है। पत्र के भाग  पत्र के निम्नलखित भाग होते हैं- 1. शीर्षक अर्थात् लेखक का पता तथा तिथि। यह बाएं हाथ की ओर कोने में सबसे ऊपर होना चाहिए। यदि पत्र औपचारिक अथवा व्यपार या कार्य सम्बन्ध...